Tuesday, 22 March 2016

नववर्ष की शुभकामनाएँ : 2016 - शिवम [ Nav-varsh Ki Shubhkamnayen : Shivam ]


जीवन, भूत से निकलकर, वर्तमान से होते हुए, भविष्य की और (From the past, through the present, and to the future) जाता हुआ एक सतत प्रवाह है. भूत, वर्तमान और भविष्य समय की विभिन्न कलाएँ (Phases) हैं. अतः, जीवन समय से उत्पन्न होकर, समय से होते हुए, समय में ही विलीन हो जाता है.

समय एक सर्वव्यापी एवं सार्वकालिक सत्ता है, अतएव हमारे जीवन के सभी कार्य-कलापों का साक्षी है.

सृष्टि, कार्य-कारण (Cause-Effect) न्याय के अधीन है. भूत, वर्तमान का कारण है एवं वर्तमान भविष्य का. कार्य-कारण न्याय को हम क्रिया-प्रतिक्रया-क्रिया का एक अंतहीन क्रम भी कह सकते हैं. क्रिया विधेयी (Positive) वस्तु है, जबकि प्रतिक्रया परिणामात्मक (Reactive). क्रिया विवेक (Rationality) की पहचान है एवं प्रतिक्रया उसका समयजन्य परिणाम. कर्ता (Doer), कार्य-कारण न्याय का एक आवश्यक अवयव है.


मनुष्य एकमात्र ज्ञात विवेकशील प्राणी है, अतएव अपने द्वारा की गई क्रियाओं का करता है तथा उसके समयजन्य प्रतिक्रया का भोक्ता भी.
मनुष्य जाने-अनजाने जो भी करता है, उसका प्रतिफल प्रतिक्रया दसके रूप में मिलना अपरिहार्य है बिना किसी अपवाद के. कब और कैसे? यह समझना मानवीय क्षमता से परे है.

संक्षेप में यह समझने की आवश्यकता है कि हम जो कुछ भी करते हैं वो बिना किसी जीव या वस्तु के सापेक्ष न करके समय के सापेक्ष न करके, समय के सापेक्ष करते है. और समय अपने सापेक्ष की गई क्रिया को आज नहीं तो कल प्रतिक्रया के रूप में वापस अवश्य करेगा. यही प्रकृति का नियम और कर्मवाद का सिद्धांत है.

समय की प्रतिक्रिया के परिणाम एवं प्रभाव क्रिया के अनुरूप होते हैं. परिणाम वस्तुनिष्ठ (Objective) चीज है एवं प्रभाव विषयनिष्ठ (Subjective). प्रतिक्रया का प्रभाव इस बात पर निर्भर कर्ता है कि कार्य के समय कर्ता की मानसिकता क्या थी.

इसलिए, मानवता की रक्षा के लिए एक सिपाही का बन्दूक चलाना एवं मानवता के विनाश के लिए एक आतंकवादी का बन्दूक चलाना दोनों एकदम भिन्न क्रियाएँ हैं. अतएव इन दोनों के समयजन्य प्रतिक्रिया प्रभाव (कर्ता पर) एकदम भिन्न होंगे.

आइये, 1 जनवरी 2016 के अवसर पर इस सत्य को समझें कि हम जो भी भला या बुरा करते हैं, वह समय के सापेक्ष में कर रहे हैं – माध्यम चाहे जो भी हो – एवं समय इसे वापस अवश्य करेगा, प्रतिक्रया के रूप में.
समय की प्रतिक्रया का प्रभाव, हम पर कैसा हो, ये हम पर निर्भर करता है.
शुभकामनाओं के साथ
इति शुभम!
- शिवम
shivamsbi@yahoo.co.in



Saturday, 19 September 2015

ओ दु:ख - भागवत शरण झा ‘अनिमेष’( O Dukh - Bhagwat Shran Jha 'Animesh' )

Pain- the real artisan of humanity. Poet Bhagwat Sharan Jha Animesh speaks from within:
ओ दु:ख
आओ मुझे मांजो
जैसे मां मांजती है बरतन
किसान पिजाता है खुरपी
संत भांजता है विवेक



ओ दु:ख
मुझे लोहार की तरह असह्य अग्निदाह दो
फिर ठोको ठांय-ठांय-ठनक-ठनक
मुझे मेरा सही आकार दो
मोती की तरह छेदो मुझे
हीरे की तरह काटो-तराशो
सोने की तरह करो मेरी अम्ल-परीक्षा
ओ दु:ख हो सके तो मेरे मन में कर दो
पांच-सात छेद
फिर बजने दो मुझे बांसुरी की तरह

ओ दु:ख
जीवन का स्थायी भाव तेरे सिवाय कौन ?
ओ दु:ख
दे दो मुझको मेरा महामौन
कि मैं भी शिव बनकर विषपान करूं
क्योंकि मुझे पता है कि मैं तुझसे भाग सकता हूँ
बच नहीं सकता.
-----
(-भागवत शरण झा ‘अनिमेष’) मोबाइल-8086911256

Saturday, 5 September 2015

अकथ-रस -भागवत शरण झा ‘अनिमेष’ ( Akath Ras - Bhagwat Sharan Jha 'Animesh' )

अकथ-रस (-भागवत शरण झा ‘अनिमेष’) मोबाइल: 08986911256

रात अकथ-रस भीनी साथी मौन मुखर सौ बार

आज समय के पास समय है

जीवन में जीवन है


लय है


जीवन के दिन चार


बात अकथ-रस-भीनी साथी मौन मुखर सौ बार

...


जग है सोया रात जगी है

बात रात की प्रेम-पगी है

नीरव

नेह प्रगाढ़

रात चदरिया झीनी साथी मौन मुखर सौ बार
...

रात अकथ-रस-चित्रकथा है

सुख में अनुदित सकल व्यथा है

फलित

ललित भिनसार

रात अजब रस-भीनी साथी आज शिखर पर प्यार

रात अकथ-रस भीनी साथी मौन मुखर सौ बार.

(-भागवत शरण झा ‘अनिमेष’) मोबाइल: 08986911256

नयन- भागवत शरण झा ‘अनिमेष’ ( Nayan - Bhagwat Sharan Jha 'Animesh')

नयन (कवि- भागवत शरण झा अनिमेष’) मो. 08986911256

नयन तेज तरछेउआ हंसुली
हंस-हंस करे हलाल

बिन देखे यह जनम अकारथ
जिन देखे
बेहाल

तक नयन में सकल सुहावन
लाग लगावन
भाग जगावन
मादक मध्रुर मलाल

एक नयन में श्यामल बादल
जिसको जग
कहता है काजल
एक साथ संकोच चपलता का यह
गहरा ताल

नयन तेज तरछेउआ हंसुली
मन-बस करे हलाल

(-भागवत शरण झा अनिमेष’) मो. 08986911256

Tuesday, 19 August 2014

खो गया है भीड़ में जो आदमी - भागवत 'अनिमेष' ( Kho gaya hai bhid me jo aadmi - Bhagwat 'Animesh' )




खो गया है भीड़ में जो आदमी 
- भागवत 'अनिमेष'

खो गया है भीड़ में जो आदमी,बन्धु ! मैं उस मौन का पर्याय हूँ 
हूँ तुम्हारे बीच की बिडम्बना, आज खुद से माँगता मैं न्याय हूँ। 

सम्बन्ध का हर बन्ध क्रंदन कर रहा 
नेह सरिता रिक्त होती जा रही है 
खो गए तुम अर्थयुग के अर्थ में 
शेष बातें व्यर्थ होती जा रही हैं 

जानता युगसत्य और युगधर्म मैं, बन्धु मैं तेरी तरह निरुपाय हूँ 
खो गया है भीड़ में जो आदमी,बन्धु ! मैं उस मौन का पर्याय हूँ 

ठहरी, ठिठकी, सहमी-सी यह चाँदनी 
कुछ अधूरे प्रश्न हमसे पूछती है 
हर कमल पर यन्त्रयुग की यंत्रणा 
आज के मनु को न श्रद्धा सूझती है

खुल सकी ना मन की कोमल ग्रन्थियाँ, बन्धु मैं उस स्वप्न का अभिप्राय हूँ 
खो गया है भीड़ में जो आदमी,बन्धु ! मैं उस मौन का पर्याय हूँ। 

(- भागवत 'अनिमेष')
मोबाइल - 8986911256





Wednesday, 29 January 2014

Adding professionalism to theater of Patna - Suresh Kumar Hazzu


Suresh Kumar Hazzu- Adding professionalism to theater of Patna
Suresh Kr. Hazzu- holding mike in hand




Suresh Kumar Hazzu is a reknowned veteran theatre artist of Patna. He is active in drama arta since last three decades. His believes in, " Buy ticket and watch theatare".

Today on 29.01.2014 a play titled "Saiya Bhaye Kotwal" was staged in Premchand Rangshala, Rajendranagar, Patna which was presented by Hazzu Musical Theatre (HMT). HMT was founded by Suresh Hazzu in 1998. The drama was a thorough success in terms of presentation of story embedded with music and dance.

Wednesday, 13 November 2013

मैं टुकड़ा एक बादल का ( Mai Tukra Ek Baadal Ka - Hindi Poem ) - by Vineet Aman Agrawal

Mai Tukra Ek Baadal Ka (Hindi Poem) - by Dr. Vineet Aman Agrawal 
Dr. Vineet, MBBS,  MBA (NMIMS, Mumbai)




Dr. Vineet Aman Aggarwal is MBBS, MBA (NMIMS, Mumbai) and does not belong to Patna. Link of Vineet: http://www.facebook.com/l.php?u=http%3A%2F%2Fwww.decodehindumythology.blogspot.com%2F&h=OAQEhlmSg